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एक भावुक शिवसैनिक की पीड़ा… “लापता ईशान्य मुंबई”

 एक भावुक शिवसैनिक की पीड़ा… “लापता ईशान्य मुंबई” 



प्रति,

माननीय श्री एकनाथ शिंदे साहेब

माननीय श्री नरेश म्हस्के साहेब


विषय: शिवसेना एवं उत्तर भारतीय संघटन शिवसेना में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, संगठन में एकजुटता की कमी और ईशान्य मुंबई की वर्तमान स्थिति को लेकर एक शिवसैनिक की भावनाएँ।


 जय महाराष्ट्र! जय शिवसेना! 


साहेब,


आज मन बहुत व्यथित है। यह पोस्ट किसी पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उस विचारधारा, उस संगठन और उस शिवसेना के प्रति समर्पित एक शिवसैनिक की पीड़ा है, जिसके लिए हमने अपना समय, सम्मान और भावनाएँ समर्पित की हैं।


जिस शिवसेना की नींव हिंदुहृदय सम्राट माननीय श्री बालासाहेब ठाकरे साहेब के विचारों और धर्मवीर श्री आनंद दिघे साहेब के संस्कारों पर रखी गई, जिस शिवसेना को माननीय श्री एकनाथ शिंदे साहेब आगे बढ़ा रहे हैं, आज उसी संगठन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं, जो मन को भीतर तक आहत करती हैं।


क्या आज शिवसेना में कार्यकर्ता की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है?


आज ऐसा महसूस होने लगा है कि कुछ पदाधिकारी स्वयं को नेता समझने लगे हैं और यह भूलते जा रहे हैं कि वे सबसे पहले शिवसैनिक हैं। पद की जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं की समस्याएँ सुनना, उन्हें उचित मार्गदर्शन देना और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहना है। लेकिन जब कार्यकर्ता अपनी समस्या लेकर जाता है और उसे न सुनवाई मिलती है, न मार्गदर्शन, तो उसका मन टूटना स्वाभाविक है।


साहेब, संगठन केवल पदाधिकारियों से नहीं, बल्कि उन हजारों निष्ठावान कार्यकर्ताओं से बनता है, जो बिना किसी स्वार्थ के दिन-रात पार्टी के लिए काम करते हैं। कार्यकर्ता ही शिवसेना की असली ताकत है। यदि वही उपेक्षित महसूस करने लगे, तो संगठन को मजबूत करने का सपना कैसे साकार होगा?


आज शिवसेना एवं उत्तर भारतीय संघटन शिवसेना में पदाधिकारियों के बीच एकजुटता की कमी और आपसी समन्वय का अभाव भी चिंता का विषय है। जब नेतृत्व में एकजुटता नहीं दिखती, तो उसका सीधा असर जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन की मजबूती पर पड़ता है।


 और सबसे बड़ा सवाल — हमारा ईशान्य मुंबई आखिर कहाँ खो गया?


आज परिस्थितियाँ देखकर मन में एक ही शब्द गूंजता है—


 “लापता ईशान्य मुंबई” 


वह ईशान्य मुंबई कहाँ है, जहाँ शिवसैनिकों की आवाज़ में ताकत होती थी? वह संगठन कहाँ है, जहाँ कार्यकर्ता को अपनापन और सम्मान मिलता था? वह एकजुटता कहाँ है, जिसके बल पर शिवसेना हर चुनौती का सामना करती थी?


एक और बात दिल को बहुत दुख पहुँचाती है। जब कार्यकर्ताओं और मुंबई जिला स्तर के पदाधिकारियों को अपनी बात रखने के लिए बालासाहेब भवन तक पहुँचने में कठिनाई होती है और उन्हें हॉल के अंदर वाले गेट पर ही रोक दिया जाता है, तो मन में सवाल उठता है—आखिर क्यों?


क्या बालासाहेब भवन केवल पद और पहचान रखने वालों के लिए है? क्या उस भवन पर उन सामान्य शिवसैनिकों का अधिकार नहीं, जिन्होंने संगठन को खड़ा करने में अपना जीवन और समय लगाया है?


साहेब, यह सवाल किसी का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि संगठन में कार्यकर्ताओं के सम्मान और सहज पहुँच की आवश्यकता को सामने रखने के लिए हैं।


हमें पद नहीं, सम्मान चाहिए। हमें दिखावा नहीं, मार्गदर्शन चाहिए। हमें गुटबाजी नहीं, एकजुटता चाहिए। हमें नेताओं की भीड़ नहीं, बालासाहेब के विचारों पर चलने वाले सच्चे शिवसैनिक चाहिए।


हम चाहते हैं कि शिवसेना केवल नाम से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, अपने संस्कार और अपने कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशीलता से भी पुरानी शिवसेना की विरासत को जीवित रखे।


आज भी दिल में भगवा है, मन में बालासाहेब के विचार हैं और धर्मवीर आनंद दिघे साहेब के संस्कारों के प्रति सम्मान है। लेकिन जब अपने ही संगठन में कार्यकर्ता स्वयं को अकेला और उपेक्षित महसूस करने लगे, तो उस पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता।


माननीय एकनाथ शिंदे साहेब और नरेश म्हस्के साहेब से विनम्र निवेदन है कि इन भावनाओं को एक सामान्य शिवसैनिक की शिकायत नहीं, बल्कि संगठन की जमीनी स्थिति को समझने का अवसर मानें।


कृपया कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सुनने, पदाधिकारियों के बीच समन्वय बढ़ाने और बालासाहेब भवन में कार्यकर्ताओं की सहज पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में ध्यान दें।


क्योंकि साहेब, संगठन कमजोर तब नहीं होता जब विरोधी मजबूत होते हैं; संगठन तब कमजोर होता है जब अपने ही कार्यकर्ता स्वयं को अकेला महसूस करने लगते हैं।


मेरा उद्देश्य किसी से नाराज़गी जताना नहीं, बल्कि उस शिवसेना को मजबूत देखना है, जिसके लिए आज भी दिल में वही सम्मान और समर्पण है।


अंत में बस इतना ही कहूँगा—


“बालासाहेब के विचारों वाली शिवसेना चाहिए, आनंद दिघे साहेब के संस्कारों वाली शिवसेना चाहिए और एकनाथ शिंदे साहेब के नेतृत्व में ऐसी शिवसेना चाहिए, जहाँ हर कार्यकर्ता को सम्मान मिले, उसकी बात सुनी जाए और उसे अपनेपन का एहसास हो।”


 लापता ईशान्य मुंबई को फिर से जीवंत करना है।

 कार्यकर्ता का सम्मान वापस लाना है।

 शिवसेना की एकजुटता को मजबूत बनाना है।


इसी उम्मीद और इसी पीड़ा के साथ…


आपका एक समर्पित शिवसैनिक,


एडवोकेट आनंद शुक्ला

शिवसैनिक, ईशान्य मुंबई 

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